‘घूसखोर पंडत’ नाम पर SC सख्त’ समाज विशेष को बदनाम करने पर जताई आपत्ति, बिना बदलाव रिलीज पर रोक

नई दिल्ली | 12 फरवरी, 2026 अभिनेता मनोज बाजपेयी की आने वाली फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ कानूनी पचड़े में बुरी तरह फंस गई है। सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म के शीर्षक (Title) पर गहरी आपत्ति जताते हुए डायरेक्टर नीरज पांडे और नेटफ्लिक्स को फटकार लगाई है। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुयान की बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक फिल्म का नाम नहीं बदला जाता, इसे रिलीज करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

“पब्लिसिटी के लिए विवादित नाम क्यों?” – सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई के दौरान अदालत ने फिल्म के निर्माताओं से तीखे सवाल पूछे:

  • जातिवाद पर प्रहार: कोर्ट ने पूछा, “आप ऐसा टाइटल इस्तेमाल करके समाज के एक खास वर्ग को क्यों बदनाम कर रहे हैं? क्या अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब किसी समुदाय को नीचा दिखाना है?”

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  • पब्लिक ऑर्डर का हवाला: बेंच ने कहा कि इस तरह के शीर्षक नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था (Public Order) के खिलाफ हैं और देश में अशांति पैदा कर सकते हैं।

  • पब्लिसिटी स्टंट: जस्टिस नागरत्ना ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे विवादित नाम अक्सर केवल पब्लिसिटी और सस्ती लोकप्रियता बटोरने के लिए रखे जाते हैं।

मेकर्स का पक्ष और कोर्ट का आदेश

फिल्म निर्माता की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने सोशल मीडिया से सभी प्रमोशनल मटीरियल और टीजर हटा लिए हैं। उन्होंने नाम बदलने पर भी सहमति जताई है। हालांकि, कोर्ट ने निर्देश दिया कि:

  1. नया टाइटल पेश करें: मेकर्स को जल्द से जल्द फिल्म का नया प्रस्तावित नाम अदालत के सामने पेश करना होगा।

  2. हलफनामा दाखिल करें: डायरेक्टर नीरज पांडे को एक एफिडेविट देना होगा कि फिल्म का कंटेंट किसी भी समुदाय या वर्ग की गरिमा को ठेस नहीं पहुँचाता है।

  3. नोटिस जारी: कोर्ट ने केंद्र सरकार, सेंसर बोर्ड (CBFC) और फिल्म निर्माताओं को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।

क्यों हो रहा है विरोध?

ब्राह्मण समाज और विभिन्न हिंदू संगठनों ने इस टाइटल को अपमानजनक बताया था। उनका तर्क है कि ‘पंडत’ शब्द को ‘घूसखोर’ जैसे नकारात्मक विशेषण के साथ जोड़ना पूरे समुदाय की प्रतिष्ठा को धूमिल करने की कोशिश है। इस मामले में लखनऊ समेत कई शहरों में एफआईआर भी दर्ज कराई गई थी।

“जब तक आप हमें बदला हुआ नाम नहीं बताते, हम फिल्म रिलीज की इजाजत नहीं देंगे। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता असीमित नहीं है।” > — सुप्रीम कोर्ट की बेंच

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