Nirjala Ekadashi 2026— हिंदू धर्म में सबसे कठिन और महत्वपूर्ण मानी जाने वाली निर्जला एकादशी इस वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाएगी। इसे भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन बिना जल ग्रहण किए व्रत रखने से साल भर की सभी 24 एकादशियों के बराबर फल प्राप्त होता है। भगवान विष्णु की विशेष कृपा पाने के लिए इस दिन दान-पुण्य और तुलसी पूजन का विशेष महत्व है।
Nirjala Ekadashi 2026: ज्येष्ठ माह की निर्जला एकादशी पर इस विधि से करें तुलसी चालीसा का पाठ, बरसेगी श्रीहरि की कृपा

निर्जला एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त और तिथि
पंचांग गणना के अनुसार, ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी तिथि का प्रारंभ 26 मई 2026 को सुबह 08:15 बजे से होगा और इसका समापन 27 मई 2026 को सुबह 06:40 बजे होगा। उदय तिथि की गणना के आधार पर निर्जला एकादशी का व्रत 26 मई, मंगलवार को रखा जाएगा। व्रत का पारण 27 मई को सुबह 05:25 से 08:10 के बीच किया जा सकेगा।
तुलसी चालीसा का महत्व और विधि
भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है। शास्त्रों के अनुसार, विष्णु जी को अर्पित किए जाने वाले किसी भी भोग में यदि तुलसी दल न हो, तो वे उसे स्वीकार नहीं करते। एकादशी के दिन तुलसी चालीसा का पाठ करने से न केवल श्रीहरि बल्कि माता लक्ष्मी भी प्रसन्न होती हैं, जिससे घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
श्री तुलसी चालीसा (Shree Tulsi Chalisa)
“नमो नमो तुलसी महारानी, सब की वरदानी।
जय जय तुलसी माता, महिमा अमित न जाई कही।”
— लोक प्रचलित भक्ति पाठ
पाठ की विधि: एकादशी की शाम को तुलसी के पौधे के पास घी का दीपक जलाएं। शुद्ध आसन पर बैठकर एकाग्र मन से तुलसी चालीसा का पाठ करें। ध्यान रहे कि एकादशी के दिन तुलसी के पत्तों को तोड़ना वर्जित है, इसलिए पूजा के लिए गिरे हुए पत्तों का ही प्रयोग करें या एक दिन पूर्व ही पत्ते तोड़कर रख लें।
दान का विशेष महत्व: गर्मी में शीतलता का संदेश
ज्येष्ठ की भीषण गर्मी में पड़ने वाले इस व्रत के दौरान जल संरक्षण और दान का संदेश दिया जाता है। इस दिन राहगीरों को पियाऊ लगवाना, मीठा जल पिलाना और मिट्टी के घड़े (कलश) का दान करना सर्वोत्तम माना गया है। इसके अलावा पंखा, खरबूजा और वस्त्र दान करने से पितृ दोष से भी मुक्ति मिलती है।
वाराणसी के विद्वान पंडितों का कहना है कि जो श्रद्धालु शारीरिक अस्वस्थता के कारण पूर्ण निर्जल व्रत नहीं रख सकते, वे फलाहार के साथ भी यह अनुष्ठान कर सकते हैं। मुख्य उद्देश्य मन की शुद्धता और भगवान के प्रति समर्पण है।