“चुनावी मैदान को असमान बनाने की कोशिश”: पत्र के मुख्य बिंदु
हमें मिली जानकारी के मुताबिक, यह पत्र 20 अप्रैल 2026 को लिखा गया. इसमें 18 अप्रैल को प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए संबोधन की जांच की मांग की गई है. पत्र में कहा गया है कि जब पांच राज्यों में चुनाव के कारण आचार संहिता लागू है, तब सार्वजनिक मंचों (Doordarshan और Sansad TV) का उपयोग करके विपक्षी दलों पर ‘भ्रूण हत्या’ जैसे गंभीर आरोप लगाना अनुचित है. शिकायतकर्ताओं का तर्क है कि यदि पीएम को संबोधन की अनुमति दी गई थी, तो अन्य दलों को भी अपनी बात रखने के लिए राष्ट्रीय मीडिया पर समान समय मिलना चाहिए.
पत्र लिखने वालों में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह, पूर्व नौकरशाह नजीब जंग, एमजी देवसहायम, शिक्षाविद जोया हसन, संगीतकार टी.एम. कृष्णा और योगेंद्र यादव जैसे बड़े नाम शामिल हैं. इनका कहना है कि पीएम ने संबोधन में विपक्ष पर महिलाओं के सपनों को कुचलने का आरोप लगाकर मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश की है, जो चुनावी निष्पक्षता के खिलाफ है |
विपक्ष का हमला और पीएम का रुख: क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद 17 अप्रैल को लोकसभा में महिला आरक्षण बिल के पास न होने के बाद शुरू हुआ. अगले दिन, 18 अप्रैल की शाम को पीएम मोदी ने राष्ट्र को संबोधित किया. उन्होंने विपक्ष पर तीखा हमला करते हुए कहा कि कुछ दलों ने जानबूझकर महिलाओं के अधिकारों को रोका है. पीएम ने कहा, “एनडीए सरकार हार नहीं मानेगी, हम महिलाओं को सशक्त बनाने के हर अवरोध को दूर करेंगे.” इस संबोधन को विपक्ष ने ‘चुनावी भाषण’ बताया. टीएमसी नेता डेरेक ओ’ब्रायन ने आरोप लगाया कि सरकार महिलाओं को ‘डिकॉय’ (मोहरा) की तरह इस्तेमाल कर रही है. 2026 के इस चुनावी माहौल में, जहां बंगाल और अन्य राज्यों में वोटिंग की तैयारी चल रही है, बुद्धिजीवियों के इस पत्र ने चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ा दिया है. क्या आयोग पीएम मोदी के खिलाफ कोई कड़ा कदम उठाएगा?
“यह संबोधन पूरी तरह से राजनीतिक था और इसका उद्देश्य चुनाव से ठीक पहले मतदाताओं की भावनाओं को भड़काना था. सरकारी मशीनरी का ऐसा खुला दुरुपयोग हमने पहले कभी नहीं देखा. चुनाव आयोग को अपनी निष्पक्षता साबित करनी होगी.”
— पत्र में शामिल एक प्रमुख एक्टिविस्ट
बुद्धिजीवियों की इस शिकायत ने अब गेंद चुनाव आयोग के पाले में डाल दी है. आयोग के लिए यह एक ‘अग्निपरीक्षा’ की तरह है, जहां उसे यह साबित करना होगा कि वह सत्ता पक्ष और विपक्ष के लिए समान नियम लागू करता है. अगले 48 घंटों में यह स्पष्ट हो सकता है कि क्या चुनाव आयोग पीएमओ से इस संबोधन पर जवाब तलब करता है या इसे तकनीकी आधार पर खारिज कर देता है. अगर आयोग कार्रवाई नहीं करता, तो 2026 के विधानसभा चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठना तय है. यह घटना भारतीय लोकतंत्र की मजबूती और चुनावी शुचिता के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हो सकती है |