Explainer : नई दिल्ली। कई दिनों तक चले तनाव, सैन्य कार्रवाई और कूटनीतिक दबाव के बाद अमेरिका और Iran’ के बीच फिलहाल संघर्ष विराम जैसी स्थिति बन गई है। दोनों देशों के बीच हुए ताजा समझौते ने युद्ध की आशंकाओं को काफी हद तक कम कर दिया है। हालांकि अभी अंतिम शांति समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर होना बाकी है, इसलिए दुनिया की निगाहें 19 जून को जेनेवा में होने वाली संभावित वार्ता पर टिकी हुई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति को पूरी तरह शांति नहीं कहा जा सकता। दोनों देशों के बीच एक प्रारंभिक सहमति बनी है, लेकिन अंतिम समझौते तक पहुंचने के लिए कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति आवश्यक होगी। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय विश्लेषक इसे “डील करने की डील” का नाम दे रहे हैं।
आखिर युद्ध में कौन जीता?
इस सवाल का जवाब आसान नहीं है। अमेरिका और ईरान दोनों ही अपने-अपने तरीके से जीत का दावा कर रहे हैं।
अमेरिका का कहना है कि उसने अपने रणनीतिक उद्देश्यों को हासिल किया और क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत किया है। वहीं ईरान का दावा है कि उसने दबाव के बावजूद अपने राष्ट्रीय हितों और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं किया तथा बाहरी दबाव के सामने झुकने से इनकार किया।
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार वास्तविकता यह है कि दोनों पक्षों को नुकसान भी हुआ और दोनों को कुछ कूटनीतिक लाभ भी मिले। इसलिए इसे किसी एक पक्ष की स्पष्ट जीत के रूप में नहीं देखा जा सकता।
जेनेवा समझौते पर टिकी दुनिया की नजर
19 जून को जेनेवा में प्रस्तावित शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने की संभावना जताई जा रही है। यदि यह समझौता सफलतापूर्वक संपन्न हो जाता है तो पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव कम हो सकता है और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी राहत मिल सकती है।
विशेष रूप से तेल बाजार, ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ने की उम्मीद है। युद्ध की आशंका के कारण वैश्विक बाजारों में जो अनिश्चितता बनी हुई थी, वह भी कम हो सकती है।
अभी क्यों बनी हुई है अनिश्चितता?
हालांकि दोनों देशों के बीच सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं, लेकिन अंतिम दस्तावेज पर हस्ताक्षर होने तक किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। कूटनीतिक सूत्रों का कहना है कि कई तकनीकी और राजनीतिक बिंदुओं पर अभी भी बातचीत जारी है।
एक वरिष्ठ विश्लेषक ने स्थिति की तुलना शादी की रस्म से करते हुए कहा, “लगता है शादी की तैयारी और रस्में पूरी हो गई हैं, लेकिन अंगूठी अभी तक नहीं दिखाई गई है।” यानी समझौते की रूपरेखा तो तैयार है, लेकिन अंतिम पुष्टि अभी बाकी है।
यदि जेनेवा में प्रस्तावित समझौता सफल रहता है तो अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव में बड़ी कमी आ सकती है। वहीं अगर किसी मुद्दे पर सहमति नहीं बनती है तो वार्ता प्रक्रिया में नई बाधाएं भी आ सकती हैं।
फिलहाल दुनिया को 19 जून का इंतजार है, जब यह स्पष्ट हो सकेगा कि दोनों देश स्थायी शांति की ओर बढ़ रहे हैं या फिर बातचीत का यह दौर अभी और लंबा चलेगा। इतना तय है कि इस समझौते का असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी इसका प्रभाव दिखाई देगा।