Gyanvapi Case : ज्ञानवापी केस में समझौते की राह मुश्किल, मध्यस्थता पर मंदिर-मस्जिद पक्ष ने कहा ‘ना’

Path to settlement in Gyanvapi case difficult Path to settlement in Gyanvapi case difficult
Path to settlement in Gyanvapi case difficult

Gyanvapi Case : एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट की पहल के बाद वाराणसी के जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) ने ज्ञानवापी विवाद से जुड़े पक्षकारों को मंगलवार को कचहरी परिसर स्थित मध्यस्थता केंद्र में बुलाया है। उद्देश्य यह है कि लंबे समय से अदालतों में लंबित इस विवाद का समाधान आपसी सहमति और मध्यस्थता के माध्यम से तलाशा जा सके।

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हालांकि, सुनवाई से पहले ही मंदिर पक्ष और मस्जिद पक्ष दोनों ने इस प्रक्रिया पर असहमति जताई है। ऐसे में मध्यस्थता की यह पहल सफल होगी या नहीं, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।

चार मामलों पर होगी मध्यस्थता केंद्र में सुनवाई

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जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव एवं सिविल जज (सीनियर डिवीजन) राजीव मुकुल पांडेय की अध्यक्षता में मध्यस्थता केंद्र में चार अलग-अलग पत्रावलियों पर सुनवाई प्रस्तावित है।

इन मामलों में प्रमुख रूप से शामिल हैं—

मां शृंगार गौरी के दर्शन-पूजन से जुड़े दो वाद।
व्यासपीठ के दिवंगत सोमनाथ व्यास के नाती शैलेंद्र पाठक की ओर से तलगृह में पूजा-पाठ के अधिकार की मांग वाला मामला।
ज्ञानवापी विवाद से संबंधित एक अन्य लंबित वाद।

सुप्रीम कोर्ट की पहल के तहत इन मामलों को विशेष लोक अदालत और मध्यस्थता प्रक्रिया के माध्यम से सुलझाने की संभावना तलाशने का प्रयास किया जा रहा है।

मंदिर पक्ष ने मध्यस्थता से किया इनकार

मंदिर पक्ष के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने स्पष्ट कहा कि वे इस प्रक्रिया से सहमत नहीं हैं।

उन्होंने कहा कि यह मामला लोक अदालत की परिधि में नहीं आता और ऐसे संवेदनशील धार्मिक एवं संवैधानिक विवाद का समाधान मध्यस्थता के जरिए नहीं किया जा सकता। उनके अनुसार इस मामले का निर्णय केवल न्यायालय द्वारा ही किया जाना उचित होगा।

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मस्जिद पक्ष ने भी जताई आपत्ति

दूसरी ओर, अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी के संयुक्त सचिव एस.एम. यासीन ने भी मध्यस्थता प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार किया है।

उन्होंने कहा कि ज्ञानवापी विवाद अत्यंत संवेदनशील है और इसे सामान्य विवादों की तरह लोक अदालत या समझौता प्रक्रिया के जरिए नहीं निपटाया जा सकता। उनका कहना है कि देश में लाखों मुकदमे लंबित हैं और इस मामले को अलग श्रेणी में रखकर मध्यस्थता के लिए भेजना उचित नहीं है।

कई अदालतों में लंबित हैं ज्ञानवापी से जुड़े मामले

ज्ञानवापी विवाद से जुड़े कई मुकदमे अलग-अलग अदालतों में विचाराधीन हैं।

वाराणसी जिला एवं सत्र न्यायालय में 36 से अधिक पत्रावलियां लंबित हैं।
इलाहाबाद हाई कोर्ट में भी कई याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है।
सुप्रीम कोर्ट में भी इस विवाद से जुड़े महत्वपूर्ण मामले लंबित हैं।

सबसे पुराना मुकदमा वर्ष 1991 से सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में चल रहा है। इसमें ज्ञानवापी परिसर में नए मंदिर के निर्माण और हिंदुओं को नियमित पूजा-पाठ का अधिकार देने की मांग की गई है।

क्या है श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर-ज्ञानवापी विवाद?

वाराणसी का श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद विवाद देश के सबसे चर्चित धार्मिक एवं कानूनी मामलों में शामिल है।

मंदिर पक्ष का दावा है कि वर्तमान ज्ञानवापी परिसर के नीचे प्राचीन आदि विश्वेश्वर मंदिर स्थित था, जिसे वर्ष 1669 में मुगल शासक औरंगजेब के आदेश पर ध्वस्त किया गया था। इस दावे के समर्थन में ऐतिहासिक दस्तावेज और पुरातात्विक साक्ष्यों का हवाला दिया जाता है।

वहीं, मस्जिद पक्ष का कहना है कि यह भूमि सदियों से वक्फ संपत्ति रही है और यहां नियमित रूप से नमाज अदा की जाती रही है।

पूजा स्थल अधिनियम 1991 बना अहम कानूनी आधार

मस्जिद पक्ष अपनी दलीलों में पूजा स्थल (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1991 का हवाला देता है।

इस कानून के अनुसार, 15 अगस्त 1947 को किसी धार्मिक स्थल की जो स्थिति थी, उसे बदला नहीं जा सकता। इसी आधार पर मस्जिद पक्ष वर्तमान स्वरूप को बनाए रखने की मांग कर रहा है।

दूसरी ओर, मंदिर पक्ष का कहना है कि इस मामले में ऐतिहासिक और धार्मिक तथ्यों की न्यायिक जांच आवश्यक है और उनके दावे अलग कानूनी आधार पर विचार योग्य हैं।

एएसआई सर्वे भी बना विवाद का केंद्र

मंदिर पक्ष की मांग पर वाराणसी जिला जज की अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से ज्ञानवापी परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कराया था।

एएसआई की रिपोर्ट में मंदिर से जुड़े अवशेष, स्थापत्य संरचनाओं और मूर्तिकला संबंधी साक्ष्य मिलने का उल्लेख किए जाने का दावा किया गया। हालांकि, मस्जिद पक्ष ने रिपोर्ट की कई बातों पर आपत्ति दर्ज कराई है और उसकी व्याख्या को चुनौती दी है।

क्या निकलेगा मध्यस्थता से कोई समाधान?

सुप्रीम कोर्ट की पहल का उद्देश्य वर्षों से चल रहे इस संवेदनशील विवाद का शांतिपूर्ण समाधान तलाशना है। लेकिन दोनों प्रमुख पक्षों द्वारा मध्यस्थता प्रक्रिया पर आपत्ति जताने के बाद फिलहाल समझौते की संभावना कमजोर दिखाई दे रही है।

अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मध्यस्थता केंद्र में होने वाली सुनवाई के दौरान कोई सहमति बनती है या फिर मामला पहले की तरह अदालतों में ही आगे बढ़ता रहेगा।

फिलहाल अदालतों की निगाह में है पूरा विवाद

ज्ञानवापी विवाद पर अंतिम निर्णय अभी किसी भी अदालत द्वारा नहीं दिया गया है। मामला वाराणसी जिला अदालत, इलाहाबाद हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में विभिन्न याचिकाओं के रूप में विचाराधीन है। ऐसे में आने वाले समय में न्यायिक प्रक्रिया ही इस बहुचर्चित विवाद की दिशा तय करेगी।

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