प्रयागराज: Allahabad High Court Corruption Remarks को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भ्रष्टाचार के खिलाफ बेहद कड़ी टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन ने कहा कि देश में भ्रष्टाचार इस स्तर तक सामान्य हो चुका है कि राम मंदिर में आए दान की कथित चोरी के विवाद से भी लोग शर्मिंदा नहीं हुए। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे मामलों से भी समाज नहीं जागता, तो यह ईमानदारी के सबसे निम्न स्तर को दर्शाता है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंदन की खंडपीठ हमीरपुर के फैमुद्दीन व दो अन्य की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ताओं ने बुलडोजर कार्रवाई की आशंका जताते हुए अदालत से संरक्षण की मांग की थी। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति श्रीधरन ने अपने 51 पन्नों के फैसले में भ्रष्टाचार पर विस्तृत टिप्पणी की।
राम मंदिर दान विवाद का किया उल्लेख
फैसले में न्यायमूर्ति श्रीधरन ने कहा कि दशकों से आम भारतीय भ्रष्टाचार को सामान्य मानने लगा है। उन्होंने ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की 2025 की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत का भ्रष्टाचार सूचकांक में पिछड़ना भी समाज को शर्मिंदा नहीं करता। उन्होंने राम मंदिर के लिए मिले दान में कथित चोरी के विवाद का हवाला देते हुए कहा कि यदि ऐसे मामलों से भी लोगों की संवेदनाएं नहीं जागतीं, तो यह बेहद चिंताजनक स्थिति है।
भ्रष्टाचारियों के लिए कड़ी सजा की जरूरत
Allahabad High Court Corruption Remarks के दौरान न्यायमूर्ति श्रीधरन ने कहा कि भ्रष्टाचार के दोषियों के लिए मृत्युदंड जैसे कठोर दंड पर भी विचार किया जाना चाहिए। हालांकि यह टिप्पणी न्यायिक अवलोकन (Judicial Observation) के रूप में की गई है, न कि कोई बाध्यकारी कानूनी निर्देश के रूप में।
अवैध निर्माण पर अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की बात
पीठ ने कहा कि नगर निगम और अन्य विकास प्राधिकरणों के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की मिलीभगत से अवैध निर्माण होते हैं। रिश्वत लेकर नियमों की अनदेखी की जाती है और बाद में कार्रवाई होने पर सबसे अधिक नुकसान आम नागरिकों को उठाना पड़ता है। अदालत ने कहा कि यदि अवैध निर्माण गिराए जाएं तो संबंधित दोषी अधिकारियों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
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बुलडोजर कार्रवाई पर महत्वपूर्ण निर्देश
न्यायमूर्ति श्रीधरन ने अपने फैसले में निर्देश दिया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद दो वर्ष तक किसी आरोपी का घर ध्वस्त नहीं किया जाना चाहिए। साथ ही यदि कोई व्यक्ति किसी संपत्ति में तीन वर्ष या उससे अधिक समय से रह रहा है, तो ध्वस्तीकरण से एक वर्ष पहले नोटिस देकर उसे वैकल्पिक व्यवस्था का अवसर दिया जाए।
हालांकि, इन निर्देशों पर न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंदन ने असहमति जताई। उनका कहना था कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट इस प्रकार की निश्चित समय-सीमा निर्धारित नहीं कर सकता। दोनों न्यायाधीशों के मतभेद के कारण यह मामला अब तीसरे न्यायाधीश के समक्ष भेजा जाएगा।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनके रिश्तेदार आफान खान पर पॉक्सो और धर्मांतरण से जुड़े मामलों में आरोप हैं, लेकिन जिन संपत्तियों पर कार्रवाई की जा रही है, उनका उससे कोई स्वामित्व संबंध नहीं है। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने अदालत में कहा कि याचिकाकर्ता फैमुद्दीन स्वयं भी संबंधित मामले में जेल जा चुके हैं और उन्होंने महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाया है।