CG High Court : विदेशी MBBS डॉक्टरों को हाईकोर्ट से झटका’ सिम्स में जमा 1 लाख रुपये की फीस नहीं होगी वापस, पुराने स्टाइपेंड की मांग भी खारिज

CG High Court : बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी कर बिलासपुर के छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) में इंटर्नशिप करने वाले विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट (FMG) डॉक्टरों को बड़ा झटका दिया है। हाईकोर्ट ने इंटर्नशिप के दौरान जमा की गई एक लाख रुपये की फीस वापस करने और भारतीय मेडिकल कॉलेजों के छात्रों के समान पुराने स्टाइपेंड का भुगतान करने की मांग खारिज कर दी है। इस संबंध में दाखिल तीन अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) के वर्ष 2021 में लागू नए नियमों का लाभ पिछली अवधि के लिए नहीं दिया जा सकता।

हाईकोर्ट ने तीनों याचिकाएं की खारिज

इस मामले की सुनवाई जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ में हुई। मुख्य याचिका डॉ. श्यामू कुमार जांगड़े और 13 अन्य डॉक्टरों की ओर से दायर की गई थी। इसके अलावा डॉ. छत्रेश चौधरी और डॉ. प्रणव पांडेय ने भी अलग-अलग याचिकाएं दाखिल की थीं।

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तीनों याचिकाओं में कानूनी और तथ्यात्मक प्रश्न समान होने के कारण हाईकोर्ट ने इनकी एक साथ सुनवाई की। सुनवाई के बाद अदालत ने तीनों याचिकाओं को खारिज कर दिया।

एक लाख रुपये फीस वापसी की थी मांग

विदेश से एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन डॉक्टरों ने सिम्स बिलासपुर में इंटर्नशिप की थी। इस दौरान उनसे एक लाख रुपये फीस जमा कराई गई थी। डॉक्टरों का कहना था कि इंटर्नशिप के लिए जमा कराई गई इस राशि को वापस किया जाना चाहिए।

इसके साथ ही उन्होंने इंटर्नशिप अवधि के पुराने बकाया स्टाइपेंड का भुगतान भी भारतीय मेडिकल कॉलेजों के छात्रों के समान करने की मांग की थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने उनकी दोनों मांगों को स्वीकार नहीं किया।

NMC के 2021 नियमों को लेकर अदालत की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ताओं ने अपनी विदेशी मेडिकल डिग्रियां 18 नवंबर 2021 से पहले हासिल की थीं। ऐसे में वे राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग के वर्ष 2021 में लागू हुए नए नियमों के आधार पर पिछली अवधि के लिए अतिरिक्त लाभ का दावा नहीं कर सकते।

अदालत के अनुसार, नए नियमों को उनके लागू होने से पहले की अवधि पर पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता। इसी कानूनी आधार पर डॉक्टरों की मांगों को राहत देने योग्य नहीं माना गया।

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