कोरबा, छत्तीसगढ़ | कटघोरा वनमंडल के जटगा रेंज में हाथियों का आतंक अब ग्रामीणों के लिए जीवन और मृत्यु का प्रश्न बन गया है। इलाके में मौजूद 40 हाथियों के एक विशाल दल ने धोबीबारी गांव में भारी तबाही मचाई है, जिससे पूरे क्षेत्र में दहशत का माहौल है। प्रशासन और वन विभाग के दावों के बीच ग्रामीण खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर हैं।
धोबीबारी गांव में आधी रात को तांडव
शनिवार की रात हाथियों के दल ने धोबीबारी गांव पर धावा बोल दिया। हाथियों ने देखते ही देखते पांच ग्रामीणों के घरों को तहस-नहस कर दिया।
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नुकसान: घरों के भीतर रखा राशन, बर्तन और अन्य कीमती सामान हाथियों ने पूरी तरह चौपट कर दिया है।
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पलायन: अपनी जान बचाने के लिए ग्रामीणों ने आनन-फानन में सुरक्षित स्थानों और ऊंचे इलाकों में शरण ली। ग्रामीणों का कहना है कि उनके सामने अब सबसे बड़ी चुनौती ‘जिंदा रहना’ है, क्योंकि उनके पास न सिर छिपाने को छत बची है और न खाने को दाना।
ग्राउंड जीरो पर फंसे पत्रकार: दहशत की लंबी रात
इलाके की जमीनी हकीकत जानने पहुंचे अंचल के चार पत्रकार भी बीती रात मौत के साये में रहे। हाथियों की तेज चिंघाड़ सुनकर पत्रकार एक सुरक्षित स्थान पर फंस गए और पूरी रात हिलने-डुलने की स्थिति में नहीं थे।
“हाथियों की चिंघाड़ इतनी भयावह थी कि हमें महसूस हुआ कि दहशत भरी रातें कितनी लंबी होती हैं। सुबह होने का इंतजार किसी युग के बीतने जैसा था।” — एक प्रत्यक्षदर्शी पत्रकार
वन विभाग की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
इस घटना ने वन विभाग द्वारा गठित ‘हाथी मित्र दल’ और मैदानी अमले की मुस्तैदी पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
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निगरानी में चूक: जब 40 हाथियों का इतना बड़ा दल आबादी क्षेत्र के इतने करीब था, तो समय रहते ग्रामीणों को अलर्ट क्यों नहीं किया गया?
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सुरक्षा के इंतजाम: ग्रामीणों का आरोप है कि वन अमला केवल कागजों पर अलर्ट रहता है, जबकि धरातल पर लोग अपनी जान बचाने के लिए खुद संघर्ष कर रहे हैं।
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हाथी मित्र दल: हाथी मित्र दल की सक्रियता और हाथियों को रिहाइशी इलाकों से दूर रखने की उनकी रणनीति विफल साबित हो रही है।