‘देवदूत’ बने CRPF के जवान’ दंतेवाड़ा-बीजापुर बॉर्डर पर 3 माह की बीमार बच्ची को मिला नया जीवन; जवानों ने कंधे पर उठाकर पार किया दुर्गम रास्ता

दंतेवाड़ा/बीजापुर | 4 अप्रैल, 2026 नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग में सुरक्षा बल के जवान न केवल देश की सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा की रक्षा कर रहे हैं, बल्कि समय-समय पर स्थानीय ग्रामीणों के लिए ‘रक्षक’ और ‘देवदूत’ की भूमिका भी निभा रहे हैं। ताजा मामला दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले की सीमा पर स्थित घोर नक्सल प्रभावित तिमिनार गांव का है, जहां सीआरपीएफ CRPF के जवानों ने अपनी तत्परता से एक 3 माह की मासूम बच्ची की जान बचा ली।

क्या थी पूरी स्थिति?

तिमिनार गांव, जो अपने दुर्गम रास्तों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के लिए जाना जाता है, वहां एक ग्रामीण परिवार की महज 3 महीने की मासूम बच्ची अचानक गंभीर रूप से बीमार पड़ गई। बच्ची को तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव और मुख्य सड़क से दूरी होने के कारण परिजन उसे अस्पताल ले जाने में असमर्थ महसूस कर रहे थे।

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जवानों ने संभाला मोर्चा

इलाके में गश्त (पेट्रोलिंग) पर निकले CRPF (संभावित 195वीं वाहिनी या स्थानीय यूनिट) के जवानों को जैसे ही बच्ची की गंभीर हालत की सूचना मिली, उन्होंने बिना वक्त गंवाए मदद का हाथ बढ़ाया।

  • दुर्गम रास्ता: गांव से अस्पताल तक का रास्ता पथरीला और ऊबड़-खाबड़ था, जहां एंबुलेंस का पहुंचना नामुमकिन था।

  • कंधे पर स्ट्रेचर: जवानों ने तत्काल एक अस्थाई स्ट्रेचर तैयार किया और बच्ची को सुरक्षित तरीके से उस पर लिटाकर अपने कंधों पर उठा लिया।

  • पैदल तय किया सफर: जवानों ने कई किलोमीटर का सफर पैदल ही तय किया ताकि बच्ची को जल्द से जल्द चिकित्सा सहायता मिल सके।

समय पर मिला इलाज, हालत में सुधार

जवानों ने बच्ची को निकटतम स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाया, जहां डॉक्टरों की टीम ने तुरंत उसका उपचार शुरू किया। डॉक्टरों के अनुसार, अगर बच्ची को अस्पताल लाने में थोड़ी भी देरी होती, तो उसकी जान को गंभीर खतरा हो सकता था। वर्तमान में बच्ची की स्थिति स्थिर बताई जा रही है और वह डॉक्टरों की निगरानी में है।

ग्रामीणों ने जताया आभार

नक्सलवाद के साये में जीने वाले ग्रामीणों के लिए जवानों का यह मानवीय चेहरा प्रेरणादायक रहा। बच्ची के माता-पिता और तिमिनार गांव के ग्रामीणों ने सीआरपीएफ के जवानों के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि “वर्दी वाले” हमारे असली दोस्त हैं, जो संकट के समय हमेशा साथ खड़े रहते हैं।

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