Importance of offering Food To God : थाली से प्रभु के चरणों तक: भोग के पीछे छिपी अटूट श्रद्धा और समर्पण की कहानी

Importance of offering Food To God :  वाराणसी, 3 जनवरी 2026 – भारतीय संस्कृति में रसोई केवल भोजन बनाने का स्थान नहीं, बल्कि भक्ति का एक पावन केंद्र भी है। जब एक भक्त अपनी थाली से पहला ग्रास अलग निकालकर भगवान के चरणों में अर्पित करता है, तो वह केवल एक धार्मिक रस्म नहीं निभा रहा होता, बल्कि ब्रह्मांड के उस रचयिता के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त कर रहा होता है।

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श्रद्धा का मूक संवाद

हिंदू धर्म के दर्शन में ‘भोग’ लगाना महज एक परंपरा नहीं, बल्कि समर्पण की वह मूक भाषा है जिसे किसी शब्द की आवश्यकता नहीं होती। यह इस शाश्वत सत्य की स्वीकारोक्ति है कि हमारे मेज पर सजा भोजन या जीवन का वैभव, सब कुछ उसी ईश्वर की अनुकंपा का परिणाम है। यह रस्म हमें याद दिलाती है कि हम संसाधनों के मालिक नहीं, बल्कि केवल उनके संरक्षक हैं।

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जब हम प्रभु को भोग अर्पित करते हैं, तो यह एक पवित्र संवाद की तरह होता है जिसमें भक्त का हृदय पुकार उठता है। इस प्रक्रिया में भोजन का भौतिक स्वरूप तो वहीं रहता है, लेकिन भक्त का ‘भाव’ ईश्वर तक पहुँच जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, परमात्मा भौतिक पदार्थों के स्वाद के बजाय केवल भक्त के प्रेम और उसकी निष्ठा का भूखा होता है।

उपभोग से पहले त्याग का संस्कार

भोग लगाने की यह कला हमें जीवन में साझा करने और हर स्थिति में कृतज्ञ रहने का पाठ पढ़ाती है। यह हमें सिखाती है कि स्वयं के उपभोग से पहले त्याग की भावना होनी चाहिए, जो मन को अहंकार से मुक्त करती है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, यह छोटी सी परंपरा हमें रुकने और उस परम शक्ति को धन्यवाद देने का अवसर देती है जो निरंतर हमारा पालन-पोषण कर रही है।

आध्यात्मिक गुरुओं का मानना है कि भोग लगाने की प्रक्रिया का मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी गहरा होता है, जो मन में शांति और संतोष का संचार करता है। जब भोजन को भगवान को समर्पित कर दिया जाता है, तो वह साधारण आहार से ‘प्रसाद’ में बदल जाता है। प्रसाद ग्रहण करने का यही अनुभव व्यक्ति को एक विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा और पवित्रता से भर देता है।

भक्ति का मूल मंत्र

“हे प्रभु! आपने जो हमें दिया है, उसका पहला हिस्सा आपके चरणों में समर्पित है।”

यह कथन उस निस्वार्थ भाव को दर्शाता है जहाँ भक्त यह मानता है कि ईश्वर भोजन के भौतिक अंश को नहीं, बल्कि उस पवित्र भावना को ग्रहण करते हैं जो अर्पण के समय मन में होती है। यही वह क्षण है जहाँ साधारण अन्न दिव्य बन जाता है।

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