Swami Avimukteshwaranand : नेताओं पर बरसे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद , चुनाव के लिए बनाई गई एकता का कोई मोल नहीं

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  • बड़ा हमला: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि नेताओं की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है।
  • एकता का मुद्दा: यदि एकता केवल वोटों के लिए है, तो उसका कोई सामाजिक महत्व नहीं।
  • ध्रुवीकरण: धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण को समाज के हित की कसौटी पर कसना जरूरी।

Swami Avimukteshwaranand , बिलासपुर — छत्तीसगढ़ की न्यायधानी पहुंचे शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने आज देश की मौजूदा राजनीतिक स्थिति पर करारा प्रहार किया। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि राजनेताओं के वादों और उनके असली इरादों के बीच की खाई गहरी होती जा रही है। एक निजी कार्यक्रम के दौरान मीडिया से चर्चा करते हुए उन्होंने एकता और धर्म के नाम पर हो रही सियासत को कटघरे में खड़ा किया।

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सियासी पिच पर ‘एकता’ की गुगली

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि आज देश में एकता की बात तो खूब होती है, लेकिन इसके पीछे के मकसद अक्सर राजनीतिक होते हैं। उन्होंने आगाह किया कि जो एकता सिर्फ चुनाव जीतने या किसी विशेष दल को फायदा पहुँचाने के लिए बनाई जाती है, वह समाज का भला कभी नहीं कर सकती।

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  • राजनीतिक लाभ: एकता को टूल की तरह इस्तेमाल करने पर जताई नाराजगी।
  • सामाजिक कसौटी: उन्होंने तर्क दिया कि एकता हो या ध्रुवीकरण, अंतिम परिणाम समाज का विकास होना चाहिए।
  • धार्मिक राजनीति: धर्म के नाम पर समाज को बांटने की कोशिशों पर चिंता जाहिर की।

शंकराचार्य का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में विभिन्न मुद्दों पर धार्मिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज है। उन्होंने सीधे तौर पर नेताओं को अपनी नैतिकता और सार्वजनिक वादों पर टिके रहने की नसीहत दी है।

“राजनेताओं की कथनी और करनी में बड़ा फर्क है। एकता केवल राजनीतिक लाभ के लिए नहीं होनी चाहिए। यदि ध्रुवीकरण से समाज को लाभ होता है, तभी वह सार्थक है, अन्यथा वह व्यर्थ है।”
— स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, शंकराचार्य

शंकराचार्य का यह रुख संकेत देता है कि धार्मिक नेतृत्व अब राजनीतिक विमर्श में केवल मूकदर्शक बनकर नहीं रहेगा। राजनेताओं की ‘कथनी और करनी’ पर सवाल उठाकर उन्होंने जनता को यह संदेश दिया है कि वे केवल नारों पर न जाएं, बल्कि वास्तविक काम को देखें। आने वाले चुनावों में इस तरह के बयान मतदाताओं के नजरिए को प्रभावित कर सकते हैं, खासकर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में जहां धार्मिक आस्थाओं का राजनीति पर गहरा प्रभाव रहता है।

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