राखी पर चंद्र ग्रहण का संकट! जानें भाई की कलाई पर कब बांधें रक्षासूत्र, क्या मान्य होगा सूतक काल?

Lunar eclipse threat on Rakhi Lunar eclipse threat on Rakhi
Lunar eclipse threat on Rakhi

राखी पर चंद्र ग्रहण का संकट— देश भर में भाई-बहन के पवित्र त्योहार रक्षाबंधन को लेकर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, लेकिन इस बार 28 अगस्त 2026 को श्रावण पूर्णिमा के दिन लगने जा रहे चंद्र ग्रहण ने लोगों के बीच संशय की स्थिति पैदा कर दी है। खगोलीय गणनाओं के अनुसार, इस दिन एक गहरा आंशिक चंद्र ग्रहण (Partial Lunar Eclipse) लगने जा रहा है। त्योहार के दिन ही इस खगोलीय घटना के होने से देश के नागरिक और श्रद्धालु इस बात को लेकर चिंतित हैं कि क्या इस दिन भाइयों की कलाई पर राखी बांधी जा सकेगी या ग्रहण के कारण त्योहार के रंग में भंग पड़ेगा।

Lunar eclipse threat on Rakhi
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सुबह 6:52 से शुरू होगा ग्रहण, बनेगा ‘ब्लड मून’ का नजारा

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खगोल विज्ञानियों के अनुसार, यह ग्रहण भारतीय मानक समयानुसार सुबह 6 बजकर 52 मिनट पर शुरू होगा और दोपहर 12 बजकर 32 मिनट तक चलेगा। करीब 5 घंटे 39 मिनट की लंबी अवधि वाले इस ग्रहण के दौरान पृथ्वी की छाया चंद्रमा के लगभग 96 प्रतिशत हिस्से को ढक लेगी। इस गहरी आंशिक स्थिति के कारण चंद्रमा पूरी तरह काला नहीं होगा, बल्कि पृथ्वी के वायुमंडल से छनकर पहुंचने वाली रोशनी की वजह से यह तांबे जैसे या हल्के लाल रंग का दिखाई देगा। अंतरिक्ष विज्ञान की भाषा में इस खूबसूरत और दुर्लभ नजारे को ‘ब्लड मून’ भी कहा जाता है। ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक, यह ग्रहण कुंभ राशि और शतभिषा नक्षत्र में लगने जा रहा है।

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आम नागरिकों पर असर: क्या बंद रहेंगे मंदिरों के कपाट?

भारत में ग्रहण की दृश्यता शून्य होने के कारण इसका आम जनजीवन या धार्मिक अनुष्ठानों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा। सूतक काल प्रभावी न होने की वजह से देश के सभी प्रमुख मंदिरों के कपाट सामान्य दिनों की तरह खुले रहेंगे और दैनिक पूजा-आरती बिना किसी बाधा के संपन्न होगी। बहनें अपने भाइयों को पूरे दिन किसी भी शुभ मुहूर्त में राखी बांध सकेंगी। हालांकि, स्थानीय पंडितों का कहना है कि ग्रहण का सूतक भले ही न लग रहा हो, लेकिन रक्षाबंधन के पारंपरिक नियमों के तहत बहनों को दोपहर के समय लगने वाले भद्रा काल से जरूर सावधान रहना चाहिए और भद्रा की अवधि को छोड़कर ही रक्षा सूत्र बांधना चाहिए।

यह ग्रहण मुख्य रूप से उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और प्रशांत महासागर के क्षेत्रों में साफ तौर पर दिखाई देगा, जहां स्थानीय विजिबिलिटी के आधार पर सूतक और ग्रहण के कड़े नियमों का पालन करना अनिवार्य होगा।

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