वॉशिंगटन: Trump Generic Drug Tariff को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने आयातित जेनेरिक दवाओं पर चरणबद्ध तरीके से टैरिफ (आयात शुल्क) लागू करने की योजना पेश की है। ट्रंप के अनुसार, 1 अगस्त 2026 से दो वर्षों तक जेनेरिक दवाओं पर 0% टैरिफ रहेगा। इसके बाद एक वर्ष के लिए 100% और फिर 2028 के बाद इसे बढ़ाकर 200% कर दिया जाएगा।
ट्रंप ने कहा कि इस नीति का उद्देश्य दवा निर्माण को दोबारा अमेरिका में लाना और विदेशी कंपनियों को अमेरिकी धरती पर मैन्युफैक्चरिंग यूनिट स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना है। उन्होंने चेतावनी दी कि तय समय सीमा के भीतर उत्पादन इकाइयां स्थापित नहीं करने वाली कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है।
Trump Generic Drug Tariff
अमेरिका में दवा निर्माण बढ़ाने पर जोर
ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को आवश्यक दवाओं के लिए दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उनका दावा है कि नई टैरिफ नीति से घरेलू फार्मास्युटिकल उद्योग को मजबूती मिलेगी और अमेरिकी नागरिकों की दवा सुरक्षा बेहतर होगी। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यह नीति फिलहाल पेटेंट वाली, ब्रांडेड और नई (इनोवेटिव) दवाओं पर लागू नहीं होगी।
भारत पर पड़ सकता है बड़ा असर
Trump Generic Drug Tariff का सबसे अधिक प्रभाव भारत के फार्मास्युटिकल सेक्टर पर पड़ने की आशंका है। भारत अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली लगभग 40% जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करता है। देश में 3,000 से अधिक US FDA-स्वीकृत दवा निर्माण संयंत्र हैं, जिसके कारण भारत को दुनिया की “फार्मेसी” भी कहा जाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि 2028 के बाद 200% टैरिफ लागू होता है तो भारतीय दवा कंपनियों की लागत बढ़ सकती है और अमेरिका को होने वाला निर्यात प्रभावित हो सकता है। इससे कई कंपनियों को अमेरिका में उत्पादन इकाइयां स्थापित करने पर भी विचार करना पड़ सकता है।
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भारतीय दवा उद्योग की अहम भूमिका
भारतीय जेनेरिक दवाएं अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण रही हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, भारतीय दवा कंपनियों ने वर्ष 2022 में अमेरिकी हेल्थकेयर सिस्टम को लगभग 219 अरब डॉलर की बचत कराई थी। वहीं, 2013 से 2022 के बीच भारतीय जेनेरिक दवाओं की वजह से अमेरिका को कुल 1.3 ट्रिलियन डॉलर की बचत हुई।
कंपनियों के सामने नई चुनौती
नई टैरिफ योजना के बाद भारतीय फार्मा कंपनियों के सामने दो विकल्प होंगे—या तो अमेरिका में निवेश कर स्थानीय उत्पादन बढ़ाएं या फिर भविष्य में भारी टैरिफ का सामना करें। ऐसे में आने वाले वर्षों में वैश्विक दवा कारोबार और भारत-अमेरिका फार्मास्युटिकल व्यापार पर इस नीति का व्यापक असर देखने को मिल सकता है।