बिलासपुर: High Court Order: छत्तीसगढ़ के आबकारी विभाग से जुड़े एक मामले में हाईकोर्ट के आदेश का समय पर पालन नहीं करना रायपुर के दो वरिष्ठ अधिकारियों को भारी पड़ गया। बिलासपुर हाईकोर्ट ने आबकारी कमिश्नर पी.एस. एल्मा और अपर आबकारी आयुक्त पी.एल. साहू को नोटिस जारी कर पूछा है कि हाईकोर्ट के आदेश की अवहेलना करने पर उनके खिलाफ न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए।
90 दिन में आदेश का पालन करने के दिए गए थे निर्देश
पूरा मामला बिलासपुर निवासी और जिला जांजगीर-चांपा में आबकारी विभाग में प्रधान आरक्षक के पद पर पदस्थ मुकेश कुमार शर्मा से जुड़ा है। उन्होंने आबकारी उप निरीक्षक (सब इंस्पेक्टर) पद के लिए आयोजित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा में हिस्सा लिया था।
याचिकाकर्ता के अनुसार, उनके सर्विस रिकॉर्ड यानी एसीआर के 15 अंक कम किए जाने के कारण उन्हें परीक्षा में असफल कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने अधिवक्ता अभिषेक पांडेय के माध्यम से हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।
एसीआर में प्रतिकूल टिप्पणी को लेकर उठे सवाल
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि वर्ष 2017, 2018 और 2019 के सर्विस रिकॉर्ड (एसीआर) में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज करने से पहले याचिकाकर्ता को कारण बताओ नोटिस और सुनवाई का उचित अवसर नहीं दिया गया था।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व के न्यायिक फैसलों का हवाला देते हुए संबंधित विभाग को निर्देश दिया था कि 90 दिनों के भीतर अन्य एसीआर के आधार पर मुकेश कुमार शर्मा के मामले पर दोबारा विचार (रिकंसीडर) किया जाए।
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9 महीने बाद भी नहीं हुआ आदेश का पालन
याचिकाकर्ता का आरोप है कि हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद करीब नौ महीने तक विभाग की ओर से आदेश का पालन नहीं किया गया। इसके बाद उन्होंने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में अवमानना याचिका दायर की।
अवमानना याचिका की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि दिसंबर 2025 में हाईकोर्ट ने 90 दिनों के भीतर मामले पर पुनर्विचार करने का स्पष्ट निर्देश दिया था, लेकिन निर्धारित अवधि बीतने के काफी समय बाद भी आदेश का पालन नहीं किया गया।
दो अधिकारियों को हाईकोर्ट का नोटिस
मामले को गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने पी.एस. एल्मा, आबकारी कमिश्नर और पी.एल. साहू, अपर आबकारी आयुक्त, रायपुर को नोटिस जारी किया है।
कोर्ट ने अधिकारियों से पूछा है कि हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं करने के मामले में उनके खिलाफ न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 के तहत कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए।
इस मामले में अब अधिकारियों के जवाब और कोर्ट की आगामी सुनवाई पर नजर रहेगी।