Three’s a crowd,too many cooks spoil the broth : आखिर क्यों कहा जाता है ‘तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा’? जानिए धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और ज्योतिषीय महत्व

Three's a crowd; too many cooks spoil the broth. Three's a crowd; too many cooks spoil the broth.
Three's a crowd; too many cooks spoil the broth.

Three’s a crowd,too many cooks spoil the broth : नई दिल्ली। भारतीय संस्कृति में शुभ और मांगलिक कार्यों से पहले कई परंपराओं और मान्यताओं का पालन किया जाता है। इनमें से एक प्रसिद्ध कहावत है “तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा”। अक्सर बड़े-बुजुर्ग किसी शुभ काम, यात्रा, विवाह, पूजा या नए कार्य के लिए निकलते समय तीन लोगों के एक साथ जाने से मना करते हैं। लेकिन क्या यह केवल अंधविश्वास है या इसके पीछे कोई धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक कारण भी छिपा है? आइए जानते हैं इस कहावत का पूरा सच और इसका महत्व।

Three's a crowd; too many cooks spoil the broth.
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क्या है ‘तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा’ का अर्थ?

“तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा” भारतीय समाज में वर्षों से प्रचलित एक लोकप्रिय कहावत है। इसका सामान्य अर्थ है कि किसी महत्वपूर्ण या शुभ कार्य में तीन लोगों का एक साथ होना कई बार बाधा या असहमति का कारण बन सकता है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर बार तीन लोगों के साथ जाने से कोई अनिष्ट ही होगा, बल्कि इसे एक पारंपरिक सावधानी के रूप में देखा जाता है।

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ज्योतिषीय दृष्टि से क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यह कहावत केवल लोक मान्यता नहीं, बल्कि यात्रा की सफलता, मानसिक संतुलन और शुभ कार्यों में एकाग्रता बनाए रखने का संकेत भी मानी जाती है। मान्यता है कि जब तीन लोग किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए साथ निकलते हैं, तो निर्णय लेने में मतभेद की संभावना अधिक रहती है। ऐसे मतभेद कार्य में देरी या बाधा उत्पन्न कर सकते हैं।

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मनोवैज्ञानिक कारण भी हैं महत्वपूर्ण

विशेषज्ञों का मानना है कि इस कहावत के पीछे एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी छिपा है।

दो लोगों के बीच निर्णय लेना अपेक्षाकृत आसान होता है।
चार या उससे अधिक लोगों में बहुमत के आधार पर फैसला लिया जा सकता है।
लेकिन तीन लोगों के समूह में कई बार दो लोग एक मत और तीसरा अलग राय रखता है, जिससे असहमति या असंतोष की स्थिति बन सकती है।

यही कारण है कि पुराने समय में इसे शुभ कार्यों के लिए उचित नहीं माना गया।

पुराने समय की यात्रा से जुड़ी मान्यता

प्राचीन काल में यात्राएं लंबी, कठिन और जोखिमभरी होती थीं। रास्तों में सुरक्षा के साधन सीमित थे और मानसिक एकाग्रता बेहद जरूरी मानी जाती थी। यदि यात्रा के दौरान किसी प्रकार का विवाद या भ्रम उत्पन्न हो जाए, तो पूरा उद्देश्य प्रभावित हो सकता था। इसलिए समाज में यह परंपरा विकसित हुई कि शुभ कार्यों के लिए तीन लोगों के बजाय दो या चार लोगों का समूह अधिक उपयुक्त माना जाए।

धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा है संबंध

सनातन धर्म में कई ऐसे नियम बताए गए हैं जिनका संबंध शुभ-अशुभ संकेतों से जोड़ा जाता है।

कई देवी-देवताओं की पूजा में तीन परिक्रमा करने की मनाही मानी जाती है।
धार्मिक परंपरा के अनुसार थाली में तीन रोटियां एक साथ नहीं परोसी जातीं, क्योंकि इसे शुभ नहीं माना जाता।
मांगलिक कार्यों में सम संख्या को कई स्थानों पर अधिक शुभ माना जाता है।

इन्हीं धार्मिक मान्यताओं के कारण “तीन तिगाड़ा काम बिगाड़ा” जैसी कहावत समाज में प्रचलित हुई।

क्या यह केवल अंधविश्वास है?

आधुनिक समय में अधिकांश विद्वान मानते हैं कि इस कहावत को अंधविश्वास की तरह नहीं, बल्कि एक सामाजिक और व्यवहारिक सीख के रूप में समझना चाहिए। इसका उद्देश्य लोगों को आपसी सामंजस्य, बेहतर निर्णय क्षमता और सकारात्मक सोच के साथ कार्य करने की प्रेरणा देना है।

आज के दौर में किसी भी कार्य की सफलता व्यक्ति की तैयारी, योजना, मेहनत और परिस्थितियों पर अधिक निर्भर करती है। इसलिए केवल तीन लोगों के साथ होने को सफलता या असफलता का आधार नहीं माना जा सकता।

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किन शुभ कार्यों में लोग आज भी रखते हैं इस मान्यता का ध्यान?
विवाह या सगाई में जाना
नई दुकान या व्यवसाय का शुभारंभ
गृह प्रवेश
धार्मिक यात्रा
पूजा-पाठ और अनुष्ठान
नए वाहन या घर की खरीदारी
किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए पहली यात्रा

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