Worship of Lord Shiva : सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के लिए बेहद खास माना जाता है। सावन के दौरान शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ती है। भक्त शिवलिंग पर जल, दूध और बेलपत्र अर्पित कर भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं। सावन के आखिरी सोमवार के मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु घरों और मंदिरों में जलाभिषेक और रुद्राभिषेक कर रहे हैं। हालांकि, कई लोग इन दोनों पूजा विधियों को एक ही मान लेते हैं, जबकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दोनों में अंतर है।
जलाभिषेक क्या है?
जलाभिषेक भगवान शिव की पूजा की सरल विधि है। इसमें शिवलिंग पर शुद्ध जल अर्पित किया जाता है। भक्त जल चढ़ाते समय ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का जाप कर सकते हैं। जलाभिषेक के लिए विशेष सामग्री या विस्तृत वैदिक अनुष्ठान की आवश्यकता नहीं होती। इसे घर के मंदिर या शिवालय में श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान भगवान शिव ने हलाहल विष का पान किया था। विष के प्रभाव से उनके शरीर में गर्मी बढ़ गई थी। मान्यता है कि देवताओं ने भगवान शिव को शीतलता प्रदान करने के लिए जल अर्पित किया। तभी से शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है।
रुद्राभिषेक किसे कहते हैं?
रुद्राभिषेक जलाभिषेक से अधिक विस्तृत और वैदिक पूजा अनुष्ठान माना जाता है। इसमें भगवान शिव के रुद्र स्वरूप की पूजा विशेष मंत्रों और पूजन सामग्री के साथ की जाती है। इस दौरान शिवलिंग का जल के साथ दूध, दही, घी, शहद और अन्य पवित्र द्रव्यों से अभिषेक किया जाता है।
रुद्राभिषेक में वैदिक मंत्रों, विशेष रूप से रुद्राष्टाध्यायी के मंत्रों का पाठ किया जाता है। आमतौर पर इसे योग्य पुरोहित के मार्गदर्शन में करवाया जाता है।
रुद्राभिषेक का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रुद्राभिषेक भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने और जीवन की बाधाओं से मुक्ति की कामना के लिए किया जाता है। भक्त मानसिक शांति, सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य और मनोकामना पूर्ति के लिए यह अनुष्ठान करवाते हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं में भी रुद्राभिषेक को ग्रह दोषों की शांति के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।