धार्मिक रहस्य: आखिर प्रभु श्री राम ने विभीषण को क्यों दिया चिरंजीवी होने का वरदान? जानिए इसके पीछे की पौराणिक कथा

Why, after all, did Lord Shri Ram grant Vibhishana the boon of immortality? Why, after all, did Lord Shri Ram grant Vibhishana the boon of immortality?
Why, after all, did Lord Shri Ram grant Vibhishana the boon of immortality?

धार्मिक रहस्य—अयोध्या. हिंदू धर्म ग्रंथों और पौराणिक महाकाव्यों में अष्ट चिरंजीवियों (आठ अमर महापुरुषों) का विशेष उल्लेख मिलता है। इन आठ जीवित महापुरुषों में लंकापति विभीषण का नाम प्रमुखता से शामिल है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने रावण के छोटे भाई विभीषण की अनन्य भक्ति और अधर्म के खिलाफ धर्म का साथ देने के संकल्प से प्रसन्न होकर उन्हें कलयुग के अंत तक अमर रहने (चिरंजीवी होने) का महावरदान दिया था।

Why, after all, did Lord Shri Ram grant Vibhishana the boon of immortality?
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अधर्म के गढ़ में धर्म का पालन: क्यों मिला विभीषण को यह वरदान?

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पौराणिक इतिहास के अनुसार, जब लंकापति रावण ने माता सीता का बलपूर्वक हरण किया, तब विभीषण अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने रावण की राजसभा में निर्भीक होकर आवाज उठाई। विभीषण ने रावण को बार-बार समझाया कि पराई स्त्री का अपहरण महापाप है और यह पूरे राक्षस कुल के समूल विनाश का कारण बनेगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि श्रीराम साक्षात परब्रह्म परमात्मा हैं और उनसे शत्रुता मोल लेना आत्मघाती है।

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रावण ने जब अपने भाई के इस धर्म सम्मत परामर्श को ठुकरा दिया और उन्हें लंका से निष्कासित कर दिया, तब विभीषण भगवान श्रीराम की शरण में आ गए। राम-रावण युद्ध के दौरान विभीषण ने न केवल सुग्रीव की सेना का मार्गदर्शन किया, बल्कि युद्ध के अंतिम चरण में रावण की मृत्यु का वह गुप्त रहस्य भी उजागर किया, जिसके बिना रावण का वध असंभव था। विभीषण ने श्रीराम को बताया कि रावण की नाभि में अमृत कलश स्थित है। इसी अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी के बाद श्रीराम ने अग्निबाण से रावण का अंत किया।

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संसार के लिए संदेश और वर्तमान में महत्व

विभीषण को मिला यह वरदान इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति का जन्म चाहे किसी भी कुल या परिवेश में हुआ हो, यदि उसके कर्म धर्म और सत्य के मार्ग पर हैं, तो ईश्वर की कृपा निश्चित है। अष्ट चिरंजीवियों में शामिल होकर विभीषण आज भी समाज को यह सीख देते हैं कि अधर्म का साथ देने वाला सगा भाई भी त्यागने योग्य है, और धर्म की रक्षा के लिए उठाया गया हर कदम पूजनीय होता है। लंका के राजा के रूप में उन्होंने न्यायप्रिय शासन की नींव रखी, जिसे आज भी याद किया जाता है।

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