Maa Durga Katha : नई दिल्ली। नवरात्र का पर्व मां दुर्गा की भक्ति, शक्ति और आराधना का प्रतीक है। इन नौ दिनों में भक्त मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। मां दुर्गा के अनेक नाम हैं, जिनमें महिषासुरमर्दिनी नाम विशेष महत्व रखता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां दुर्गा ने महिषासुर नाम के शक्तिशाली असुर का वध कर देवताओं और संसार को उसके अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। इसी कारण उन्हें महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है। आइए जानते हैं इस पौराणिक कथा की पूरी कहानी।
कौन था महिषासुर?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, महिषासुर एक शक्तिशाली असुर था। उसे महिष यानी भैंसे का रूप धारण करने की शक्ति प्राप्त थी। अपनी शक्ति और सामर्थ्य के बल पर वह देवताओं को चुनौती देने लगा। कथा के अनुसार, महिषासुर ने कठोर तपस्या कर भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उनसे वरदान प्राप्त किया।
ब्रह्मा से मिला था विशेष वरदान
मान्यता है कि महिषासुर ने भगवान ब्रह्मा से ऐसा वरदान मांगा, जिससे वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया। कथा के प्रचलित रूप में उसने यह वरदान प्राप्त किया कि उसकी मृत्यु किसी पुरुष के हाथों न हो। उसे अपनी शक्ति पर इतना घमंड हो गया कि उसने तीनों लोकों में आतंक मचाना शुरू कर दिया।
वरदान के प्रभाव में महिषासुर ने देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। परेशान होकर सभी देवता भगवान विष्णु, भगवान शिव और अन्य देवताओं के पास पहुंचे और उनसे रक्षा की प्रार्थना की।
देवताओं की शक्तियों से हुआ मां दुर्गा का प्राकट्य
पौराणिक मान्यता के अनुसार, महिषासुर के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने के लिए देवताओं की संयुक्त शक्तियों से मां दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवताओं ने देवी को विभिन्न अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। भगवान शिव ने त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र और अन्य देवताओं ने भी उन्हें दिव्य शक्तियां प्रदान कीं।
सिंह पर सवार मां दुर्गा का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और शक्तिशाली था। देवी ने महिषासुर को युद्ध के लिए ललकारा।
नौ दिनों तक चला युद्ध, दसवें दिन हुआ वध
कथा के अनुसार, मां दुर्गा और महिषासुर के बीच भयंकर युद्ध हुआ। महिषासुर बार-बार अपना रूप बदलकर देवी को पराजित करने का प्रयास करता रहा, लेकिन मां दुर्गा ने उसके सभी प्रयास विफल कर दिए। अंततः देवी ने उसका वध कर दिया।
महिषासुर का संहार करने के कारण मां दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी कहा जाता है। कई परंपराओं में इस विजय को नौ दिनों के युद्ध और दसवें दिन असत्य पर सत्य की जीत के रूप में याद किया जाता है।